इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक मुकदमे में एक बार आरोप तय हो जाने के बाद अभियुक्त को उन्हें बदलने या हटाने के लिए आवेदन करने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने कानपुर देहात के एक मामले की सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 216 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 239 केवल न्यायालय को सशक्त बनाने वाले प्रविधान हैं, न कि किसी पक्षकार को अधिकार देने वाले।

मुकदमे से जुड़े तथ्य ये हैं कि शिवली थाने में वर्ष 2022 में दर्ज मुकदमे में अभियुक्त प्रवीन पाल के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत दुष्कर्म की गंभीर धाराएं लगी हैं। अभियुक्त ने तर्क दिया था कि हाईस्कूल प्रमाण पत्र के अनुसार पीड़िता घटना के समय बालिग थी, इसलिए पॉक्सो एक्ट की धाराएं हटाई जानी चाहिए।

ट्रायल कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया था। उक्त आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा, केवल न्यायालय ही अपनी मर्जी से निर्णय के पहले किसी भी समय आरोपों में बदलाव या वृद्धि कर सकता है, यदि उसे उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ऐसा करना आवश्यक लगे।

अभियुक्त अथवा शिकायतकर्ता (वादी मुकदमा) इसे अधिकार के रूप में नहीं मांग सकते, क्योंकि ऐसा करने की अनुमति देने से मुकदमे की कार्यवाही में अनावश्यक देरी होगी और त्वरित न्याय की अवधारणा प्रभावित होगी। हाई कोर्ट ने अभियुक्त की याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया है।

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